Saturday, 27 December 2014

जाने क्यूँ
अब वो
उदास रहने लगा है
गाहे बगाहे
गिनता रहता है
शाख से
झरते पत्तों को...
दरिया के करीब
युही घंटों बैठकर
तकता रहता है
लहरों को ....
अक्सर
बारिश में
बाहें फैलाकर
समेटता है
बूंदों को ....
और अब भी
छत पर
चढकर
वो उड़ा रहा होगा
अबाबील........

@मोनिका शुक्ला

अक्सर
बचपन
ऐसे याद आता है
जैसे
रात की ख़ामोशी में
बादलों से निकलकर
पेड़ों पर
पसर गयी हो
कुछ आकृतियां ...
फिर तब
सहेज कर रखी
बहुत सारी यादें
लगाने लगती हैं
गोल गोल चक्कर
बजने लगता है
जीवन का संगीत
जिसे बस सुनते ही
रहना चाहता है मन....
आने लगती है
दूर कहीं जंगल से
खिले हुए फूलों की गंध
खुशबु की बारिश में
भीग कर तरबतर
हो जाता है मन...
तब नाचने लगता है
बचपन का स्वप्न महल
उधर पूरी रात
सोया रहता है आँगन
और सरकता है वक़्त
रफ्ता रफ्ता.......

@मोनिका शुक्ला

Friday, 28 November 2014

जानते हो तुम भी
कि तुमसे जुड़कर
बहती रहती है
हर पल
मेरे भीतर
खुशी की ....इक नदी ।
मेरे बंद ओठों की आवाज़
जिसे महसूस कर
सुन पा रहे  हो
बस......तुम ।
थाम रखी है तुमने
मेरे  बौराए
अकुलाये
मन की ....डोर  ।
तो बहुत यकीं हैं तुम पर 
या कहूँ ....
खुद के प्रेम पर
कि ......अब
दिल चाह रहा है
तुम्हारे कांधे पर
टिका कर सिर
रो लूँ कुछ देर
भिगो कर तुम्हे
कर दूँ
खुद में .....तर बतर

@मोनिका शुक्ला

Tuesday, 25 November 2014

उस दिन
पहाड़ से उतरते हुए
अचानक याद आ गये तुम
ऐसा नही है कि
यह पहली मर्तबा हुआ
हाँ......तुम्हारी याद
अब भी है
और अक्सर
मेरे आस पास / डोलती रहती है
वोई तुम्हारी खुशबु
कुछ...गीली सी ।
और अक्सर
रात के सन्नाटे में
धक् से.......चौंक जाता है दिल
जब महसूस होती है
तुम्हारे ओंठों की छुअन
मेरे .....माथे पर ।
हाँ तो .......उस दिन फिर
पहाड़ से उतरते हुए
तुम्हारी याद ........
साथ हो ली / आहिस्ता से ।
तब .....तभी
पतझड़ की हवा
धूप छांव करने लगी
और .....तुम्हारे साथ
उस नदी में
बहुत गहरे ....
मै भी उतरती गयी     

@मोनिका शुक्ला          ँ

Saturday, 22 November 2014

उसकी छत से होकर
जो आयी है अभी
बहकती हवा
कहीं दहका न दे
मेरे कुछ
सुलगते ख्वाब....
जो छिप कर
बैठे हैं....
पलकों की ओट में
...तो गुमशुदा
उसकी यादें
झट से आ जायेंगी
जैसे तीली से
भक से निकलती रोशनी
..और मुझे रुलायेंगी
हंसाएंगी...पगलायेंगी
अब....आने लगी है
धीरे धीरे
अमलतास के नए पत्तों से
उसकी पहिचानी खुशबु
और गिरने ही वाला है
मेरी पोरों मेंे
इक कतरा
छिपा उसका प्रेम

@मोनिका शुक्ला

Thursday, 20 November 2014

गंध
उसके होने की
उसके जाने के /बाद भी
आती रहती है
न जाने  / कैसी गंध
न किसी फ़ूल की
न किसी पछिया पवन की
फिर भी भाती है
आधी रात में.....
जुगनू के चमकने जैसी
मन को अच्छी लगती है
जंगली फूल से
टपकते ओस जैसे
अंगड़ाई भरते...
अलसाए तन में....
अब बस रही है...
भीगी भीगी सी
उसकी गंध

मोनिका शुक्ला

Saturday, 24 May 2014

बंद तो कर लिए हैं
सभी दरवाजे
पर अब भी
बेरोक टोक
चला आता है व़ो
शायद खिड़की से होकर
कभी रोशन दान के रास्ते
और कभी कभी तो
दरवाजे की पतली झिरी से होकर
पसर जाता है घर में
लाख कोशिशों के बाद भी
वो आ ही जाता है
झट से
जैसे आलमारी खोलते ही
धडाधड गिरती हैं किताबें
छत पर चलते पंखे के साथ
फेंकता रहता है हरपल
अपने होने का एहसास
बिखेरे रखता है अपना वजूद
न जीने देता है
न मरने देता है
मिटने नही देता है
स्लेट पर लिखी इबारत

@मोनिका शुक्ला

क्यों करनी पडती है
सुख की अभिलाषा
और क्यों...
बिन मांगे
हर बार
चले आते हैं
दुःख जीवन में

ं नई कोपलें
दिन गिन गिन कर
चेहरा चमकाती हैं
और क्यों..
पतझड़ में
झड जाते हैं
सारे पत्ते
शाखों से

ों छिटक रहे
वो पल छिन सारे
साथ कभी जो बांटे
और क्यों....
बस रह जाती हैं
भूली बिसरी यादें
इस मन में

@मोनिका शुक्ला

Friday, 16 May 2014

उस रोज़ भी
बहुत जोर से बरसा था पानी
जब तुम ख़ामोश खड़े थे
और मै सुनना चाह रही थी
उस तेज़ शोर में भी..
वो आवाज़ जो आ रही थी
तुम्हारे दिल से....
बेंध रही थी तुम्हारी चुप्पी
मेरे अंतर्मन को
इक अनकही सी बात
जो मोहताज़ न थी शब्दों की
सुन ली थी मैने..
दूर उस शाख पर
कुछ फ़ूल जो निकले थे
अभी कल ही
बेबस से झुके जा रहे थे
कांपे जा रहे थे
कि कहीं मिल न जाए
मिट्टी में..यूहीं
यह बरसता पानी
सब बहा तो ले जाता है
पर बो जाता है
मन की जमीं पर
कुछ हरियाली दूब...
छोड़े जाता है हजारों यादें..
और अब भी इस शोर में
साफ सुन रही हूँ मै..वो आवाज़
जो आ गयी है मेरे बहुत क़रीब
बस गयी है जेहन में
इक अमिट महक की मानिंद
@monica shuklaa

Friday, 9 May 2014

न जाने क्यों
इक बहका सा मौन
पसर रहा है
भीतर तक......
दिखाई दे रहा है बस
आकाश के उस छोर पर
भागती चीलों का झुण्ड.....
बिखरे पत्तों से गुज़रे
उसके डगों को
नापता रहता है
लेटा पडा रास्ता....
व्याप्त है हवा में
उसकी मौजूदगी
और बस गयी है
देह के भीतर तक
उसकी गंध....
क्यों अब भी शेष है
प्रेम जैसा कोई
संजीवन तत्व
जो तोड़ के
सन्नाटे की दीवार
उगा रही है
शायद
पत्थर पर फ़ूल
@मोनिका

Tuesday, 25 March 2014

धीरे धीरे
वो भी
मेरे सपनों में
हिस्सेदार होने लगा...
मेरे कुछ ख्व़ाब
उसके साथ
बँटने लगे..
मेरा प्रिय शगल
बस उसे सोचना
और अच्छा लगने
लगा वो..
शायद यह
वोई बात लगती है
जो ..जब होती है
तब होती है
बगैर मेरे या
हम सबके समझे
कुछ अनकही सी
कुछ अनछुई सी
उधर देखो...
उस बीज से
कुछ कोंपले
फूट रही हैं
आहिस्ता आहिस्ता....

@Monica Shukla

Tuesday, 18 February 2014

कभी कभी
दिल चाहता है
फेंक आऊँ
किसी नदी में
बहुत गहरे
तेरी यादों को

फिर सोचती हूँ
कभी अकस्मात
युहीं नदी किनारे से
गुज़रते हुए
अगर प्यास लगी
और अंजुली बना के
पानी जो पिया
तो फिर से वापस
आ जायेंगी तेरी यादें

तो अब चाह रही हूँ
बहुत दूर जाकर
उपर आसमान में
बिखेर दूं
तेरी यादों को
फिर सोचती हूँ
कभी जब
बारिश के साथ
मेरे पास वापस
आ जायेंगी तो...

तोह क्या
खोद के जमीन
बहुत भीतर तक
दफ़न कर दूँ
तेरी यादों को ..
फ़िर सोचती हूँ
मिट्टी से पानी लेकर
कोंपले फूट पड़ी तो...
फिर से वापस
आ ही जायेंगी
तेरी यादें

Saturday, 15 February 2014

वो साज़िशे
वो रंजिशे
और उसका चले जाना
फ़िर
ठहर सा गया है
वक़्त के साथ
मिरा वजूद भी

मोनिका

Friday, 3 January 2014

यादों के दरवाजे जब खुले
तो यकायक चलने लगी तेज हवाए
महकने लगी वही खुशबू
जो कभी तेरे होने से आती थी.....
दहकने लगे पलाश के फ़ूल
और झरने लगी पत्तों से ऒस
सरसराने लगे किताब में रखे वो गुलाब
जो कभी तेरे हाथों से गुज़रे थे...
जागने लगा मन का कोना
कि जब तक साथ थे हम
साँझा तो किये पर समझे नही वो एहसास
और आज छूना चाहते हैं तुमको........
बहुत दूर होकर भी मिरे पास हो तुम
पर दिल में वो सुकून नहीं
सोच रहे हैं ...न जाने क्यों
हर बार झट से उड़ जाती है
मुंडेर पर बैठी छोटी चिड़िया
            
मोनिका शुक्ला