अक्सर
बचपन
ऐसे याद आता है
जैसे
रात की ख़ामोशी में
बादलों से निकलकर
पेड़ों पर
पसर गयी हो
कुछ आकृतियां ...
फिर तब
सहेज कर रखी
बहुत सारी यादें
लगाने लगती हैं
गोल गोल चक्कर
बजने लगता है
जीवन का संगीत
जिसे बस सुनते ही
रहना चाहता है मन....
आने लगती है
दूर कहीं जंगल से
खिले हुए फूलों की गंध
खुशबु की बारिश में
भीग कर तरबतर
हो जाता है मन...
तब नाचने लगता है
बचपन का स्वप्न महल
उधर पूरी रात
सोया रहता है आँगन
और सरकता है वक़्त
रफ्ता रफ्ता.......
@मोनिका शुक्ला
एक गाना याद आ गया
ReplyDeleteकोई लोटा दे मेरे बीते हुए दिन