Wednesday, 22 April 2015

अब जब
तुम ही नही हो
तो शब्द भी जैसे
रूठ गये हैं
भूले भटके
आ जाते हैं कभी
तो लापरवाह
बेतरतीब से
जिन्हें मिटा देती हूँ
हर बार
लिख लिख कर.......
उडती तितलियों को
हजारों बार
बस छू भर लेने का
सम्मोहन.....
गहन अन्धकार में
डूबी रात में
हाथ पकड कर
बहुत दूर तक
तय की दूरी.....
तुम्हारे स्नेह भरे
बोलों से
तृप्त होता रहा मन
फिर न जाने क्यों
किसी कोरे कागज़ पर
टपके......आंसू जैसे
छ्प कर
उभर आती है आकृति
अब जब तुम ही नही हो
तो फिर भी रहती है
तुम्हारी शेष स्मृति

@मोनिका शुक्ला