यादों के दरवाजे जब खुले
तो यकायक चलने लगी तेज हवाए
महकने लगी वही खुशबू
जो कभी तेरे होने से आती थी.....
दहकने लगे पलाश के फ़ूल
और झरने लगी पत्तों से ऒस
सरसराने लगे किताब में रखे वो गुलाब
जो कभी तेरे हाथों से गुज़रे थे...
जागने लगा मन का कोना
कि जब तक साथ थे हम
साँझा तो किये पर समझे नही वो एहसास
और आज छूना चाहते हैं तुमको........
बहुत दूर होकर भी मिरे पास हो तुम
पर दिल में वो सुकून नहीं
सोच रहे हैं ...न जाने क्यों
हर बार झट से उड़ जाती है
मुंडेर पर बैठी छोटी चिड़िया
मोनिका शुक्ला