Saturday, 24 May 2014

बंद तो कर लिए हैं
सभी दरवाजे
पर अब भी
बेरोक टोक
चला आता है व़ो
शायद खिड़की से होकर
कभी रोशन दान के रास्ते
और कभी कभी तो
दरवाजे की पतली झिरी से होकर
पसर जाता है घर में
लाख कोशिशों के बाद भी
वो आ ही जाता है
झट से
जैसे आलमारी खोलते ही
धडाधड गिरती हैं किताबें
छत पर चलते पंखे के साथ
फेंकता रहता है हरपल
अपने होने का एहसास
बिखेरे रखता है अपना वजूद
न जीने देता है
न मरने देता है
मिटने नही देता है
स्लेट पर लिखी इबारत

@मोनिका शुक्ला

क्यों करनी पडती है
सुख की अभिलाषा
और क्यों...
बिन मांगे
हर बार
चले आते हैं
दुःख जीवन में

ं नई कोपलें
दिन गिन गिन कर
चेहरा चमकाती हैं
और क्यों..
पतझड़ में
झड जाते हैं
सारे पत्ते
शाखों से

ों छिटक रहे
वो पल छिन सारे
साथ कभी जो बांटे
और क्यों....
बस रह जाती हैं
भूली बिसरी यादें
इस मन में

@मोनिका शुक्ला

Friday, 16 May 2014

उस रोज़ भी
बहुत जोर से बरसा था पानी
जब तुम ख़ामोश खड़े थे
और मै सुनना चाह रही थी
उस तेज़ शोर में भी..
वो आवाज़ जो आ रही थी
तुम्हारे दिल से....
बेंध रही थी तुम्हारी चुप्पी
मेरे अंतर्मन को
इक अनकही सी बात
जो मोहताज़ न थी शब्दों की
सुन ली थी मैने..
दूर उस शाख पर
कुछ फ़ूल जो निकले थे
अभी कल ही
बेबस से झुके जा रहे थे
कांपे जा रहे थे
कि कहीं मिल न जाए
मिट्टी में..यूहीं
यह बरसता पानी
सब बहा तो ले जाता है
पर बो जाता है
मन की जमीं पर
कुछ हरियाली दूब...
छोड़े जाता है हजारों यादें..
और अब भी इस शोर में
साफ सुन रही हूँ मै..वो आवाज़
जो आ गयी है मेरे बहुत क़रीब
बस गयी है जेहन में
इक अमिट महक की मानिंद
@monica shuklaa

Friday, 9 May 2014

न जाने क्यों
इक बहका सा मौन
पसर रहा है
भीतर तक......
दिखाई दे रहा है बस
आकाश के उस छोर पर
भागती चीलों का झुण्ड.....
बिखरे पत्तों से गुज़रे
उसके डगों को
नापता रहता है
लेटा पडा रास्ता....
व्याप्त है हवा में
उसकी मौजूदगी
और बस गयी है
देह के भीतर तक
उसकी गंध....
क्यों अब भी शेष है
प्रेम जैसा कोई
संजीवन तत्व
जो तोड़ के
सन्नाटे की दीवार
उगा रही है
शायद
पत्थर पर फ़ूल
@मोनिका