Saturday, 24 May 2014

बंद तो कर लिए हैं
सभी दरवाजे
पर अब भी
बेरोक टोक
चला आता है व़ो
शायद खिड़की से होकर
कभी रोशन दान के रास्ते
और कभी कभी तो
दरवाजे की पतली झिरी से होकर
पसर जाता है घर में
लाख कोशिशों के बाद भी
वो आ ही जाता है
झट से
जैसे आलमारी खोलते ही
धडाधड गिरती हैं किताबें
छत पर चलते पंखे के साथ
फेंकता रहता है हरपल
अपने होने का एहसास
बिखेरे रखता है अपना वजूद
न जीने देता है
न मरने देता है
मिटने नही देता है
स्लेट पर लिखी इबारत

@मोनिका शुक्ला

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