Wednesday, 22 April 2015

अब जब
तुम ही नही हो
तो शब्द भी जैसे
रूठ गये हैं
भूले भटके
आ जाते हैं कभी
तो लापरवाह
बेतरतीब से
जिन्हें मिटा देती हूँ
हर बार
लिख लिख कर.......
उडती तितलियों को
हजारों बार
बस छू भर लेने का
सम्मोहन.....
गहन अन्धकार में
डूबी रात में
हाथ पकड कर
बहुत दूर तक
तय की दूरी.....
तुम्हारे स्नेह भरे
बोलों से
तृप्त होता रहा मन
फिर न जाने क्यों
किसी कोरे कागज़ पर
टपके......आंसू जैसे
छ्प कर
उभर आती है आकृति
अब जब तुम ही नही हो
तो फिर भी रहती है
तुम्हारी शेष स्मृति

@मोनिका शुक्ला

Tuesday, 17 February 2015

पेपर वेट

इक छोटा
गोल सा पेपर वेट
सैकड़ों रंगीन
नन्ही नन्ही बुंदकियो
से भरा
तब उसी के
इर्द गिर्द
सिमटी थी मेरी दुनिया
साथ उसके
घंटो खेलती थी
अंदर की रंगीन
खूबसूरत दुनिया
सम्मोहित करती थी
जब छोटी थी मै...
फिर न जाने
कब वक़्त घूमा
पेपर वेट तब्दील हो गया
मायावी दुनिया में
जो रंगीन तो थी पर
अजब गजब तमाशों से भरी
धूप छाँव दिखाती
मेरा खेल ..खेल न रहा
और तब मै भी बस
इक बुंदकी बन बन रह गयी

@मोनिका शुक्ला

Sunday, 15 February 2015

प्रेम

प्रेम
एक आनन्ददायक पीड़ा
जिसे
मैने तुमने
हमने
हाँ...हम सभी ने
अनुभूत तो किया
पर
व्यक्त नही कर पाए
एक खुशबु....प्रेम
जिसे श्वास में भर लिया
और झूम लिए
अथाह उल्लास में
एक अश्रु...प्रेम
जो बह निकला
नयनो की कोर से
और डूब गये
अथाह बिषाद में
हाँ.........प्रेम इक एहसास मात्र
जिसे मैने तुमने  हम सभी ने
साक्षात्कार किया बस

@मोनिका शुक्ला

प्रेम

उसके प्रेम में
हसंता था मन
और..इसीलिये नाचता था मन
उसके प्रेम में
जाता था दिल
उस सड़क तक रोज़
जिस पर गुजरता था वो ।
उसके प्रेम में
इसी जीवन में
कई कई बार
जनम लिया ।
उसके प्रेम में
बहुत शब्द थे
मेरे पास
झहराते मेघों से ।
उसके प्रेम में
थिरकती थी दूब
रात भर
भीग कर ओस में ।
बारिश में
धुंध के साथ
चलती थी
जंगली हवा
उसके प्रेम में

@मोनिका शुक्ला

Thursday, 22 January 2015

जब चलेगी बयार

जंगल के उस पार
जब चलेगी बासंती बयार
झूम रही होंगी डालियाँ
तब इक झोंके की मानिंद
लहरा कर तेरी याद
दस्तक देगी बार बार
खटखटाएगी ह्रदय द्वार
हतप्रभ सोचूंगी मै
खोलू या न खोलू द्वार
अजनबी तुम्हारे लिए
फिर...न चाहते हुए भी
बढ जायेंगे मेरे हाथ
खुल जाएगा द्वार
तब देखूंगी कुछ नही है
सिवा इक आह के
अपलक बेबस सी तेरी यादें
ह्रदय में प्रविष्ट हो
दे जाती हैं दुःख बार बार
जंगल के उस पार
जब चलती है बासंती बयार

@मोनिका शुक्ला

Tuesday, 20 January 2015

चाहत मेरी

रत्ती भर आसमां
चाहत मेरी
टुकड़ा जमी
तमन्ना यही
कुछ दूर तक हो साथ तेरा
यह सपना मुझे
अब भाता नही
कमरों के पीछे
खिडकी के नीचे
उगने लगा कुछ
तुझे दिखता नही
किताबों में छिप कर
चुप चाप रहना
मुझको अब ये
सहना नही
तकते हैं लोग
कुछ कहते हैं वो
हँसी मुझको सबकी
अच्छी लगती नही
सुना तुमने कुछ
मै क्या कह रही हूँ
फूल खिलने लगा
तुमने देखा नही

@मोनिका शुक्ला     

Saturday, 17 January 2015

उस पेड़ की डाली पर
उगे उस फ़ूल को
जब भी देखती हूँ
तो ह्रदय के भीतर
आकार लेने लगता है
इक कोलाहल
कुछ परिचित
कुछ अपरिचित भीड़ का
न जाने क्यों
धीरे धीरे
बिखर जाती है
मुस्कान होठों पर
फिर तेज़ हवा
सुखाए देती है
आँखों में तैरते आंसू
और उस
फ़ूल की महक
ढांप लेती है
भीतर की उदासी
तब जैसे
जागने लगता है
कोई खोया हुआ
स्वप्न मेरा

@मोनिका शुक्ला

Sunday, 11 January 2015

कभी कभी
अनायास ही
सुनाई पडती है
अजीब सी पदचाप
जैसे कोई आवाज़ दे रहा हो
शायद मंद मंद हवा में
खिल रहा हो
कोई पारिजात
या उस नीम पर बैठी
काली चिड़िया की चहचहाहट
या फिर कमल के पत्तों पर
सहेज कर रखी
बारिश की कुछ बूंदें
सरक रही हों....
पर क्यों
अब भी
अपने एकांत में
खुद की आवाज़
समझ नही आती
और ...हो लेते हैं
उस अजीब पदचाप के साथ
थकी हारी देह से
निकल कर मेरे स्वप्न

@मोनिका शुक्ला

प्रेम

तेरे होने
या न होने से
कोई सरोकार नही
शब्दों से परे
बस
इक एहसास है
तेरा प्रेम....
जो ठहर गया है
अंतर्मन में
बहुत सारे सुखों
और..दुखों के साथ
पलता बढता है
पल पल......
कहीं बहुत
बहुत गहरे पैठ गया है
जम गया है जैसे
कभी न पिघलने वाली
बर्फ की तरह
बस गया है ह्रदय में
साँसों की तरह
तेरा प्रेम

@मोनिका शुक्ला

माँ

सर्दियों की छोटी दुपहरी
कितनी बड़ी हो जाती है
जब कोई भी अपना
पास नही होता है.....
बस यादों का तूफ़ान
उमड़ घुमड़ कर
बरसने को तैयार.....
पूरे घर भर में
इधर उधर
भटकने के बाद भी
सुकून नही मिलता
आती है माँ याद.........
बतिया भी लूँ कितना
पर दिल हल्का नही होता
दौड़ कर गले लग जाऊ
कहूँ ....बहुत कुछ
दुखों को डुबो दूँ ....आंसुओं के समन्दर मे
जी करता है फिर से खेलु माँ के साथ
ढूंड लूँ बचपन .....जो कहीं गुम गया है
इन सर्दियों की दुपहरी में
माँ को भी तो साल रही होगी न ...
मेरी याद

@मोनिका शुक्ला    ै