Friday, 28 November 2014

जानते हो तुम भी
कि तुमसे जुड़कर
बहती रहती है
हर पल
मेरे भीतर
खुशी की ....इक नदी ।
मेरे बंद ओठों की आवाज़
जिसे महसूस कर
सुन पा रहे  हो
बस......तुम ।
थाम रखी है तुमने
मेरे  बौराए
अकुलाये
मन की ....डोर  ।
तो बहुत यकीं हैं तुम पर 
या कहूँ ....
खुद के प्रेम पर
कि ......अब
दिल चाह रहा है
तुम्हारे कांधे पर
टिका कर सिर
रो लूँ कुछ देर
भिगो कर तुम्हे
कर दूँ
खुद में .....तर बतर

@मोनिका शुक्ला

Tuesday, 25 November 2014

उस दिन
पहाड़ से उतरते हुए
अचानक याद आ गये तुम
ऐसा नही है कि
यह पहली मर्तबा हुआ
हाँ......तुम्हारी याद
अब भी है
और अक्सर
मेरे आस पास / डोलती रहती है
वोई तुम्हारी खुशबु
कुछ...गीली सी ।
और अक्सर
रात के सन्नाटे में
धक् से.......चौंक जाता है दिल
जब महसूस होती है
तुम्हारे ओंठों की छुअन
मेरे .....माथे पर ।
हाँ तो .......उस दिन फिर
पहाड़ से उतरते हुए
तुम्हारी याद ........
साथ हो ली / आहिस्ता से ।
तब .....तभी
पतझड़ की हवा
धूप छांव करने लगी
और .....तुम्हारे साथ
उस नदी में
बहुत गहरे ....
मै भी उतरती गयी     

@मोनिका शुक्ला          ँ

Saturday, 22 November 2014

उसकी छत से होकर
जो आयी है अभी
बहकती हवा
कहीं दहका न दे
मेरे कुछ
सुलगते ख्वाब....
जो छिप कर
बैठे हैं....
पलकों की ओट में
...तो गुमशुदा
उसकी यादें
झट से आ जायेंगी
जैसे तीली से
भक से निकलती रोशनी
..और मुझे रुलायेंगी
हंसाएंगी...पगलायेंगी
अब....आने लगी है
धीरे धीरे
अमलतास के नए पत्तों से
उसकी पहिचानी खुशबु
और गिरने ही वाला है
मेरी पोरों मेंे
इक कतरा
छिपा उसका प्रेम

@मोनिका शुक्ला

Thursday, 20 November 2014

गंध
उसके होने की
उसके जाने के /बाद भी
आती रहती है
न जाने  / कैसी गंध
न किसी फ़ूल की
न किसी पछिया पवन की
फिर भी भाती है
आधी रात में.....
जुगनू के चमकने जैसी
मन को अच्छी लगती है
जंगली फूल से
टपकते ओस जैसे
अंगड़ाई भरते...
अलसाए तन में....
अब बस रही है...
भीगी भीगी सी
उसकी गंध

मोनिका शुक्ला