Friday, 28 November 2014

जानते हो तुम भी
कि तुमसे जुड़कर
बहती रहती है
हर पल
मेरे भीतर
खुशी की ....इक नदी ।
मेरे बंद ओठों की आवाज़
जिसे महसूस कर
सुन पा रहे  हो
बस......तुम ।
थाम रखी है तुमने
मेरे  बौराए
अकुलाये
मन की ....डोर  ।
तो बहुत यकीं हैं तुम पर 
या कहूँ ....
खुद के प्रेम पर
कि ......अब
दिल चाह रहा है
तुम्हारे कांधे पर
टिका कर सिर
रो लूँ कुछ देर
भिगो कर तुम्हे
कर दूँ
खुद में .....तर बतर

@मोनिका शुक्ला

No comments:

Post a Comment