Thursday, 20 November 2014

गंध
उसके होने की
उसके जाने के /बाद भी
आती रहती है
न जाने  / कैसी गंध
न किसी फ़ूल की
न किसी पछिया पवन की
फिर भी भाती है
आधी रात में.....
जुगनू के चमकने जैसी
मन को अच्छी लगती है
जंगली फूल से
टपकते ओस जैसे
अंगड़ाई भरते...
अलसाए तन में....
अब बस रही है...
भीगी भीगी सी
उसकी गंध

मोनिका शुक्ला

No comments:

Post a Comment