Tuesday, 25 March 2014

धीरे धीरे
वो भी
मेरे सपनों में
हिस्सेदार होने लगा...
मेरे कुछ ख्व़ाब
उसके साथ
बँटने लगे..
मेरा प्रिय शगल
बस उसे सोचना
और अच्छा लगने
लगा वो..
शायद यह
वोई बात लगती है
जो ..जब होती है
तब होती है
बगैर मेरे या
हम सबके समझे
कुछ अनकही सी
कुछ अनछुई सी
उधर देखो...
उस बीज से
कुछ कोंपले
फूट रही हैं
आहिस्ता आहिस्ता....

@Monica Shukla