Sunday, 16 June 2019

प्रेम

प्रेम से इतर
कुछ भी
न लिख पाती
न कह पाती
कुछ बोल...
बस लगाकर
इक पौध
गुलाब की
महसूस कर लेती हूं
तुम्हे
अपने आसपास

मोनिका

Wednesday, 22 April 2015

अब जब
तुम ही नही हो
तो शब्द भी जैसे
रूठ गये हैं
भूले भटके
आ जाते हैं कभी
तो लापरवाह
बेतरतीब से
जिन्हें मिटा देती हूँ
हर बार
लिख लिख कर.......
उडती तितलियों को
हजारों बार
बस छू भर लेने का
सम्मोहन.....
गहन अन्धकार में
डूबी रात में
हाथ पकड कर
बहुत दूर तक
तय की दूरी.....
तुम्हारे स्नेह भरे
बोलों से
तृप्त होता रहा मन
फिर न जाने क्यों
किसी कोरे कागज़ पर
टपके......आंसू जैसे
छ्प कर
उभर आती है आकृति
अब जब तुम ही नही हो
तो फिर भी रहती है
तुम्हारी शेष स्मृति

@मोनिका शुक्ला

Tuesday, 17 February 2015

पेपर वेट

इक छोटा
गोल सा पेपर वेट
सैकड़ों रंगीन
नन्ही नन्ही बुंदकियो
से भरा
तब उसी के
इर्द गिर्द
सिमटी थी मेरी दुनिया
साथ उसके
घंटो खेलती थी
अंदर की रंगीन
खूबसूरत दुनिया
सम्मोहित करती थी
जब छोटी थी मै...
फिर न जाने
कब वक़्त घूमा
पेपर वेट तब्दील हो गया
मायावी दुनिया में
जो रंगीन तो थी पर
अजब गजब तमाशों से भरी
धूप छाँव दिखाती
मेरा खेल ..खेल न रहा
और तब मै भी बस
इक बुंदकी बन बन रह गयी

@मोनिका शुक्ला

Sunday, 15 February 2015

प्रेम

प्रेम
एक आनन्ददायक पीड़ा
जिसे
मैने तुमने
हमने
हाँ...हम सभी ने
अनुभूत तो किया
पर
व्यक्त नही कर पाए
एक खुशबु....प्रेम
जिसे श्वास में भर लिया
और झूम लिए
अथाह उल्लास में
एक अश्रु...प्रेम
जो बह निकला
नयनो की कोर से
और डूब गये
अथाह बिषाद में
हाँ.........प्रेम इक एहसास मात्र
जिसे मैने तुमने  हम सभी ने
साक्षात्कार किया बस

@मोनिका शुक्ला

प्रेम

उसके प्रेम में
हसंता था मन
और..इसीलिये नाचता था मन
उसके प्रेम में
जाता था दिल
उस सड़क तक रोज़
जिस पर गुजरता था वो ।
उसके प्रेम में
इसी जीवन में
कई कई बार
जनम लिया ।
उसके प्रेम में
बहुत शब्द थे
मेरे पास
झहराते मेघों से ।
उसके प्रेम में
थिरकती थी दूब
रात भर
भीग कर ओस में ।
बारिश में
धुंध के साथ
चलती थी
जंगली हवा
उसके प्रेम में

@मोनिका शुक्ला

Thursday, 22 January 2015

जब चलेगी बयार

जंगल के उस पार
जब चलेगी बासंती बयार
झूम रही होंगी डालियाँ
तब इक झोंके की मानिंद
लहरा कर तेरी याद
दस्तक देगी बार बार
खटखटाएगी ह्रदय द्वार
हतप्रभ सोचूंगी मै
खोलू या न खोलू द्वार
अजनबी तुम्हारे लिए
फिर...न चाहते हुए भी
बढ जायेंगे मेरे हाथ
खुल जाएगा द्वार
तब देखूंगी कुछ नही है
सिवा इक आह के
अपलक बेबस सी तेरी यादें
ह्रदय में प्रविष्ट हो
दे जाती हैं दुःख बार बार
जंगल के उस पार
जब चलती है बासंती बयार

@मोनिका शुक्ला