Monday, 23 December 2013

वो जो टूटे हैं कुछ पत्ते
उस शाख से
शायद वो वही दरख्त था
जो कभी लगाया था तुमने
....और तब साथ थे हम

झूम रहा था सारा आलम
गीत गाती थी उन दिनों फ़ाख्ता
फिर न जाने कैसी हवा चली
..और पलकें होने लगीं नम

अब बस रह गईं हैं अजब तन्हाई
यादें यादें ..वहीँ तो बाक़ी हैं
कोई ख्वाहिश नहीं कि तुमसे कहें
दिल में समेटे लेते हैं अपने गम

Friday, 6 December 2013

एक औरत

जब पकड़ना चाहती है चाँद

तो उसे दिखाई देती है परछाईं

औरत

चलती है परछाईं के सहारे

बहुत दूर तक..

पर परछाईं तो ठहरी परछाईं

कब तक साथ निभाती

कभी साथ साथ

तो कभी दूर

कभी बहुत पास...

धीरे धीरे गुम होने लगी...

फिर..

फिर से औरत को याद आया चाँद

वोह चाँद की तरफ बढी

पर चाँद उसकी जद से / बहुत दूर निकल चुका था

और

इसे उहापोह में

अब उसके हाथ

ना चाँद आया

ना परछाईं

Tuesday, 3 December 2013

वो प्रेम ही था
जिसे खेल समझ
खेलते रहे हम

यूहीं बेपरवाह
हँसते मुस्काते
कभी रुठते
कभी मनाते

सारी तरकीबें आजमाते
जीतने की
पाने की

पर धरी रह गयी
सारी चाले
और मात खा गए

फिर अजब यह हालात है
कि खाली खाली सा है मन
तैरता है आँखों में पानी

...अब भान हुआ
हाँ यह प्रेम ही है ।