जंगल के उस पार
जब चलेगी बासंती बयार
झूम रही होंगी डालियाँ
तब इक झोंके की मानिंद
लहरा कर तेरी याद
दस्तक देगी बार बार
खटखटाएगी ह्रदय द्वार
हतप्रभ सोचूंगी मै
खोलू या न खोलू द्वार
अजनबी तुम्हारे लिए
फिर...न चाहते हुए भी
बढ जायेंगे मेरे हाथ
खुल जाएगा द्वार
तब देखूंगी कुछ नही है
सिवा इक आह के
अपलक बेबस सी तेरी यादें
ह्रदय में प्रविष्ट हो
दे जाती हैं दुःख बार बार
जंगल के उस पार
जब चलती है बासंती बयार
@मोनिका शुक्ला