Sunday, 11 January 2015

माँ

सर्दियों की छोटी दुपहरी
कितनी बड़ी हो जाती है
जब कोई भी अपना
पास नही होता है.....
बस यादों का तूफ़ान
उमड़ घुमड़ कर
बरसने को तैयार.....
पूरे घर भर में
इधर उधर
भटकने के बाद भी
सुकून नही मिलता
आती है माँ याद.........
बतिया भी लूँ कितना
पर दिल हल्का नही होता
दौड़ कर गले लग जाऊ
कहूँ ....बहुत कुछ
दुखों को डुबो दूँ ....आंसुओं के समन्दर मे
जी करता है फिर से खेलु माँ के साथ
ढूंड लूँ बचपन .....जो कहीं गुम गया है
इन सर्दियों की दुपहरी में
माँ को भी तो साल रही होगी न ...
मेरी याद

@मोनिका शुक्ला    ै

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