उस पेड़ की डाली पर
उगे उस फ़ूल को
जब भी देखती हूँ
तो ह्रदय के भीतर
आकार लेने लगता है
इक कोलाहल
कुछ परिचित
कुछ अपरिचित भीड़ का
न जाने क्यों
धीरे धीरे
बिखर जाती है
मुस्कान होठों पर
फिर तेज़ हवा
सुखाए देती है
आँखों में तैरते आंसू
और उस
फ़ूल की महक
ढांप लेती है
भीतर की उदासी
तब जैसे
जागने लगता है
कोई खोया हुआ
स्वप्न मेरा
@मोनिका शुक्ला
Waaaaaaaahhhgh
ReplyDeleteखोये हुए स्वप्न