Saturday, 17 January 2015

उस पेड़ की डाली पर
उगे उस फ़ूल को
जब भी देखती हूँ
तो ह्रदय के भीतर
आकार लेने लगता है
इक कोलाहल
कुछ परिचित
कुछ अपरिचित भीड़ का
न जाने क्यों
धीरे धीरे
बिखर जाती है
मुस्कान होठों पर
फिर तेज़ हवा
सुखाए देती है
आँखों में तैरते आंसू
और उस
फ़ूल की महक
ढांप लेती है
भीतर की उदासी
तब जैसे
जागने लगता है
कोई खोया हुआ
स्वप्न मेरा

@मोनिका शुक्ला

1 comment:

  1. Waaaaaaaahhhgh
    खोये हुए स्वप्न

    ReplyDelete