Saturday, 27 December 2014

जाने क्यूँ
अब वो
उदास रहने लगा है
गाहे बगाहे
गिनता रहता है
शाख से
झरते पत्तों को...
दरिया के करीब
युही घंटों बैठकर
तकता रहता है
लहरों को ....
अक्सर
बारिश में
बाहें फैलाकर
समेटता है
बूंदों को ....
और अब भी
छत पर
चढकर
वो उड़ा रहा होगा
अबाबील........

@मोनिका शुक्ला

अक्सर
बचपन
ऐसे याद आता है
जैसे
रात की ख़ामोशी में
बादलों से निकलकर
पेड़ों पर
पसर गयी हो
कुछ आकृतियां ...
फिर तब
सहेज कर रखी
बहुत सारी यादें
लगाने लगती हैं
गोल गोल चक्कर
बजने लगता है
जीवन का संगीत
जिसे बस सुनते ही
रहना चाहता है मन....
आने लगती है
दूर कहीं जंगल से
खिले हुए फूलों की गंध
खुशबु की बारिश में
भीग कर तरबतर
हो जाता है मन...
तब नाचने लगता है
बचपन का स्वप्न महल
उधर पूरी रात
सोया रहता है आँगन
और सरकता है वक़्त
रफ्ता रफ्ता.......

@मोनिका शुक्ला