Saturday, 27 December 2014

जाने क्यूँ
अब वो
उदास रहने लगा है
गाहे बगाहे
गिनता रहता है
शाख से
झरते पत्तों को...
दरिया के करीब
युही घंटों बैठकर
तकता रहता है
लहरों को ....
अक्सर
बारिश में
बाहें फैलाकर
समेटता है
बूंदों को ....
और अब भी
छत पर
चढकर
वो उड़ा रहा होगा
अबाबील........

@मोनिका शुक्ला

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