जाने क्यूँ
अब वो
उदास रहने लगा है
गाहे बगाहे
गिनता रहता है
शाख से
झरते पत्तों को...
दरिया के करीब
युही घंटों बैठकर
तकता रहता है
लहरों को ....
अक्सर
बारिश में
बाहें फैलाकर
समेटता है
बूंदों को ....
और अब भी
छत पर
चढकर
वो उड़ा रहा होगा
अबाबील........
@मोनिका शुक्ला
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