एक औरत
जब पकड़ना चाहती है चाँद
तो उसे दिखाई देती है परछाईं
औरत
चलती है परछाईं के सहारे
बहुत दूर तक..
पर परछाईं तो ठहरी परछाईं
कब तक साथ निभाती
कभी साथ साथ
तो कभी दूर
कभी बहुत पास...
धीरे धीरे गुम होने लगी...
फिर..
फिर से औरत को याद आया चाँद
वोह चाँद की तरफ बढी
पर चाँद उसकी जद से / बहुत दूर निकल चुका था
और
इसे उहापोह में
अब उसके हाथ
ना चाँद आया
ना परछाईं
bahut khub ...wallaah ..
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