Friday, 6 December 2013

एक औरत

जब पकड़ना चाहती है चाँद

तो उसे दिखाई देती है परछाईं

औरत

चलती है परछाईं के सहारे

बहुत दूर तक..

पर परछाईं तो ठहरी परछाईं

कब तक साथ निभाती

कभी साथ साथ

तो कभी दूर

कभी बहुत पास...

धीरे धीरे गुम होने लगी...

फिर..

फिर से औरत को याद आया चाँद

वोह चाँद की तरफ बढी

पर चाँद उसकी जद से / बहुत दूर निकल चुका था

और

इसे उहापोह में

अब उसके हाथ

ना चाँद आया

ना परछाईं

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