न जाने क्यों
इक बहका सा मौन
पसर रहा है
भीतर तक......
दिखाई दे रहा है बस
आकाश के उस छोर पर
भागती चीलों का झुण्ड.....
बिखरे पत्तों से गुज़रे
उसके डगों को
नापता रहता है
लेटा पडा रास्ता....
व्याप्त है हवा में
उसकी मौजूदगी
और बस गयी है
देह के भीतर तक
उसकी गंध....
क्यों अब भी शेष है
प्रेम जैसा कोई
संजीवन तत्व
जो तोड़ के
सन्नाटे की दीवार
उगा रही है
शायद
पत्थर पर फ़ूल
@मोनिका
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