उस रोज़ भी
बहुत जोर से बरसा था पानी
जब तुम ख़ामोश खड़े थे
और मै सुनना चाह रही थी
उस तेज़ शोर में भी..
वो आवाज़ जो आ रही थी
तुम्हारे दिल से....
बेंध रही थी तुम्हारी चुप्पी
मेरे अंतर्मन को
इक अनकही सी बात
जो मोहताज़ न थी शब्दों की
सुन ली थी मैने..
दूर उस शाख पर
कुछ फ़ूल जो निकले थे
अभी कल ही
बेबस से झुके जा रहे थे
कांपे जा रहे थे
कि कहीं मिल न जाए
मिट्टी में..यूहीं
यह बरसता पानी
सब बहा तो ले जाता है
पर बो जाता है
मन की जमीं पर
कुछ हरियाली दूब...
छोड़े जाता है हजारों यादें..
और अब भी इस शोर में
साफ सुन रही हूँ मै..वो आवाज़
जो आ गयी है मेरे बहुत क़रीब
बस गयी है जेहन में
इक अमिट महक की मानिंद
@monica shuklaa
Friday, 16 May 2014
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