कभी कभी
दिल चाहता है
फेंक आऊँ
किसी नदी में
बहुत गहरे
तेरी यादों को
फिर सोचती हूँ
कभी अकस्मात
युहीं नदी किनारे से
गुज़रते हुए
अगर प्यास लगी
और अंजुली बना के
पानी जो पिया
तो फिर से वापस
आ जायेंगी तेरी यादें
तो अब चाह रही हूँ
बहुत दूर जाकर
उपर आसमान में
बिखेर दूं
तेरी यादों को
फिर सोचती हूँ
कभी जब
बारिश के साथ
मेरे पास वापस
आ जायेंगी तो...
तोह क्या
खोद के जमीन
बहुत भीतर तक
दफ़न कर दूँ
तेरी यादों को ..
फ़िर सोचती हूँ
मिट्टी से पानी लेकर
कोंपले फूट पड़ी तो...
फिर से वापस
आ ही जायेंगी
तेरी यादें
जुगनू ही दीवाने निकले
ReplyDeleteअँधियारा झुठलाने निकले
ऊँचे लोग सयाने निकले
महलों में तहख़ाने निकले
वो तो सबकी ही ज़द में था
किसके ठीक निशाने निकले
आहों का अंदाज नया था
लेकिन ज़ख़्म पुराने निकले
जिनको पकड़ा हाथ समझकर
वो केवल दस्ताने निकले