Tuesday, 18 February 2014

कभी कभी
दिल चाहता है
फेंक आऊँ
किसी नदी में
बहुत गहरे
तेरी यादों को

फिर सोचती हूँ
कभी अकस्मात
युहीं नदी किनारे से
गुज़रते हुए
अगर प्यास लगी
और अंजुली बना के
पानी जो पिया
तो फिर से वापस
आ जायेंगी तेरी यादें

तो अब चाह रही हूँ
बहुत दूर जाकर
उपर आसमान में
बिखेर दूं
तेरी यादों को
फिर सोचती हूँ
कभी जब
बारिश के साथ
मेरे पास वापस
आ जायेंगी तो...

तोह क्या
खोद के जमीन
बहुत भीतर तक
दफ़न कर दूँ
तेरी यादों को ..
फ़िर सोचती हूँ
मिट्टी से पानी लेकर
कोंपले फूट पड़ी तो...
फिर से वापस
आ ही जायेंगी
तेरी यादें

1 comment:

  1. जुगनू ही दीवाने निकले
    अँधियारा झुठलाने निकले

    ऊँचे लोग सयाने निकले
    महलों में तहख़ाने निकले

    वो तो सबकी ही ज़द में था
    किसके ठीक निशाने निकले

    आहों का अंदाज नया था
    लेकिन ज़ख़्म पुराने निकले

    जिनको पकड़ा हाथ समझकर
    वो केवल दस्ताने निकले

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