Thursday, 22 January 2015

जब चलेगी बयार

जंगल के उस पार
जब चलेगी बासंती बयार
झूम रही होंगी डालियाँ
तब इक झोंके की मानिंद
लहरा कर तेरी याद
दस्तक देगी बार बार
खटखटाएगी ह्रदय द्वार
हतप्रभ सोचूंगी मै
खोलू या न खोलू द्वार
अजनबी तुम्हारे लिए
फिर...न चाहते हुए भी
बढ जायेंगे मेरे हाथ
खुल जाएगा द्वार
तब देखूंगी कुछ नही है
सिवा इक आह के
अपलक बेबस सी तेरी यादें
ह्रदय में प्रविष्ट हो
दे जाती हैं दुःख बार बार
जंगल के उस पार
जब चलती है बासंती बयार

@मोनिका शुक्ला

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