वो प्रेम ही था
जिसे खेल समझ
खेलते रहे हम
यूहीं बेपरवाह
हँसते मुस्काते
कभी रुठते
कभी मनाते
सारी तरकीबें आजमाते
जीतने की
पाने की
पर धरी रह गयी
सारी चाले
और मात खा गए
फिर अजब यह हालात है
कि खाली खाली सा है मन
तैरता है आँखों में पानी
...अब भान हुआ
हाँ यह प्रेम ही है ।
अच्छा , बहुत अच्छा लगा साफ़ कम शब्दो की शैली आपका अभिनन्दन ।
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