Tuesday, 3 December 2013

वो प्रेम ही था
जिसे खेल समझ
खेलते रहे हम

यूहीं बेपरवाह
हँसते मुस्काते
कभी रुठते
कभी मनाते

सारी तरकीबें आजमाते
जीतने की
पाने की

पर धरी रह गयी
सारी चाले
और मात खा गए

फिर अजब यह हालात है
कि खाली खाली सा है मन
तैरता है आँखों में पानी

...अब भान हुआ
हाँ यह प्रेम ही है ।

1 comment:

  1. अच्छा , बहुत अच्छा लगा साफ़ कम शब्दो की शैली आपका अभिनन्दन ।

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