वो जो टूटे हैं कुछ पत्ते
उस शाख से
शायद वो वही दरख्त था
जो कभी लगाया था तुमने
....और तब साथ थे हम
झूम रहा था सारा आलम
गीत गाती थी उन दिनों फ़ाख्ता
फिर न जाने कैसी हवा चली
..और पलकें होने लगीं नम
अब बस रह गईं हैं अजब तन्हाई
यादें यादें ..वहीँ तो बाक़ी हैं
कोई ख्वाहिश नहीं कि तुमसे कहें
दिल में समेटे लेते हैं अपने गम
lovely one
ReplyDeleteMonica